हाईवे पर दो बाइकों की भिड़ंत, मां-बेटा घायल

बिडौली। मेरठ-करनाल नेशनल हाईवे पर रविवार देर शाम केरटू फ्लाईओवर के पास दो बाइकों की भिड़ंत हो गई। हादसे में बाइक सवार मां-बेटा घायल हो गए। टक्कर इतनी जोरदार थी कि युवक की छाती की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया, जबकि महिला के हाथ की हड्डी टूट गई। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई।
जानकारी के अनुसार, बिडौली सादात निवासी सुहेल अपनी मां सितारा के साथ बाइक से कैराना क्षेत्र के गांव रामड़ा में रिश्तेदारी में गए थे। रविवार देर शाम दोनों बाइक से वापस लौट रहे थे। केरटू-मंसूरा मार्ग पर फ्लाईओवर के पास पहुंचते ही पीछे से आए अज्ञात बाइक सवार ने उनकी बाइक में जोरदार टक्कर मार दी।
टक्कर लगते ही मां-बेटा सड़क पर गिरकर घायल हो गए, जबकि उनकी बाइक बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हादसे में बाइक के कई हिस्से टूटकर सड़क पर गिर गए। आवाज सुनकर आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और घायलों को संभालते हुए परिजनों को सूचना दी। परिजन घायलों को उपचार के लिए अस्पताल ले गए। हादसे के बाद टक्कर मारने वाला बाइक सवार मौके से फरार हो गया। गनीमत रही कि हादसे में मां-बेटे की जान बच गई।

रेफ्रिजरेटर मरम्मत के दौरान गैस कंप्रेसर फटा, दो युवक झुलसे

बिडौली,झिंझाना। थाना क्षेत्र के गांव बिडौली सादात में शनिवार देर शाम रेफ्रिजरेटर की मरम्मत के दौरान गैस कंप्रेसर फटने से आग लग गई। हादसे में रेफ्रिजरेटर मिस्त्री समेत दो युवक झुलस गए। दोनों को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत में सुधार बताया जा रहा है।जानकारी के अनुसार गांव निवासी रेफ्रिजरेटर मिस्त्री आगाज रजा अपने सहायक साहिल के साथ दुकान पर रेफ्रिजरेटर की मरम्मत कर रहे थे। इसी दौरान अचानक रेफ्रिजरेटर में इस्तेमाल होने वाला गैस कंप्रेसर फट गया और देखते ही देखते आग भड़क उठी।आग की चपेट में आने से दोनों युवक झुलस गए। घटना के बाद आसपास मौजूद लोगों ने मौके पर पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास किया और कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। इसके बाद घायल युवकों को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया।
गनीमत रही कि हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई और समय रहते आग पर काबू पा लिया गया। दोनों घायलों का उपचार जारी है और उनकी हालत में सुधार बताया जा रहा है।

जाहरवीर गोगा महाराज के उपलक्ष्य में आमवाली में विशाल कंदूरी व भंडारा, हजारों श्रद्धालुओं ने लिया हिस्सा

झिंझाना। क्षेत्र के गांव आमवाली में जाहरवीर गोगा महाराज के उपलक्ष्य में श्रद्धा और उत्साह के साथ विशाल कंदूरी एवं भंडारे का आयोजन किया गया। धार्मिक आयोजन में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। सुबह से ही कार्यक्रम स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई। महिला, पुरुष, बुजुर्ग और युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर प्रसाद ग्रहण किया।
आयोजकों की ओर से करीब तीन हजार श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की विशेष व्यवस्था की गई। आयोजन स्थल पर दिनभर भक्ति और श्रद्धा का माहौल बना रहा। आसपास के गांवों से परिवार सहित पहुंचे श्रद्धालुओं ने आयोजन की व्यवस्थाओं की सराहना की।आयोजक ओमपाल कोरी ने बताया कि उनके द्वारा हर वर्ष जाहरवीर गोगा महाराज के उपलक्ष्य में कंदूरी और भंडारे का आयोजन किया जाता है। उन्होंने कहा कि हर साल करीब पांच से छह हजार श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की व्यवस्था की जाती है, जिसमें आसपास के गांवों के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग और आपसी भाईचारे से आयोजन सफल होता है। भंडारे में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर जाहरवीर गोगा महाराज से क्षेत्र में सुख-शांति और खुशहाली की कामना की। लोगों ने कहा कि इस तरह के धार्मिक आयोजन आपसी प्रेम, भाईचारे और सद्भाव को मजबूत करते हैं।
आयोजन को सफल बनाने में ओमपाल कोरी, रविंद्र कोरी और पिनू कोरी सहित अन्य लोगों का विशेष योगदान रहा। आयोजकों ने कार्यक्रम में पहुंचे सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया।

‍शिक्षक : केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने वाला शिल्पकार , शिक्षक दिवस विशेष आलेख

शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं है, जो कक्षा में खड़े होकर पुस्तकों की विषय-वस्तु समझाता है।
शिक्षक वह शिल्पकार है, जो प्रत्येक विद्यार्थी में निहित प्रतिभा को पहचानता है, उसे विकसित करता है और समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने योग्य बनाता है।

एक शिक्षक स्वयं निरंतर परिश्रम और संघर्ष करता है तथा अनेक बार अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं का त्याग कर विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपना जीवन समर्पित कर देता है। विद्यार्थी की सफलता में उसे अपनी सफलता दिखाई देती है और शिष्य की उपलब्धि उसके लिए किसी भी भौतिक संपदा से कम नहीं होती।

सच्चा शिक्षक ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ विवेक विकसित करता है।
वह सही और गलत के बीच अंतर समझाता है।
विचार करने की क्षमता विकसित करता है।
निर्णय लेने का साहस प्रदान करता है।
और सबसे बढ़कर—एक अच्छा इंसान बनने की दिशा दिखाता है।

अज्ञान और निराशा से भरे वातावरण में ज्ञान का दीप प्रज्वलित करने वाला, भटके हुए कदमों को दिशा देने वाला और निराश मन में आशा जगाने वाला यदि कोई है, तो वह शिक्षक है।

शिक्षक किताब नहीं, जीवन पढ़ना सिखाता है

एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करता, बल्कि जीवन के मूल्यों और व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा भी देता है। वह विद्यार्थियों को समझाता है कि सफलता केवल अच्छे अंक प्राप्त करने या प्रतिष्ठित नौकरी हासिल करने का नाम नहीं है।

सच्ची सफलता तब है, जब ज्ञान के साथ इंसानियत विकसित हो।
पद के साथ जिम्मेदारी आए।
अधिकार के साथ कर्तव्य-बोध हो।
और सफलता के साथ समाज के प्रति संवेदनशीलता बनी रहे।

किसी विद्यार्थी का अधिकारी बन जाना उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है, लेकिन वही अधिकारी यदि अपने पद का उपयोग ईमानदारी, न्याय, संवेदनशीलता और जनसेवा के लिए करता है, तो उसकी शिक्षा सार्थक सिद्ध होती है।

इसलिए शिक्षक का वास्तविक मूल्यांकन केवल परीक्षा परिणामों के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसके विद्यार्थियों ने समाज और राष्ट्र को कितना बेहतर बनाया।

5 सितंबर केवल एक व्यक्ति की जयंती नहीं, गुरु-परंपरा को नमन करने का अवसर है

भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान शिक्षक, दार्शनिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के रूप में शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।

हालांकि, शिक्षक दिवस का अर्थ केवल डॉ. राधाकृष्णन जी का स्मरण करने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

भारत की धरती ने युगों-युगों में ऐसे गुरुओं, शिक्षकों, चिंतकों और समाज-सुधारकों को जन्म दिया, जिन्होंने रूढ़ियों, अज्ञान, भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया तथा मनुष्य को जागरूक होने, विचार करने और अपने अधिकारों को समझने की प्रेरणा दी।

भगवान बुद्ध से लेकर संत कबीर, संत रविदास, ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर तथा ऐसे असंख्य ज्ञान-साधकों और समाज-सुधारकों तक—हमारी सभ्यता के निर्माण में गुरु और शिक्षक परंपरा का अमूल्य योगदान रहा है।

इन महापुरुषों ने केवल शिक्षा प्रदान नहीं की, बल्कि मनुष्य को स्वयं को पहचानने, प्रश्न करने, विवेक विकसित करने और मानवता के पक्ष में खड़े होने का साहस दिया।

इसलिए शिक्षक दिवस वास्तव में उन सभी गुरुजनों और ज्ञान-साधकों को नमन करने का दिन है, जिन्होंने अपने सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर मानव समाज के भविष्य के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया।

शिक्षक राष्ट्र की नींव है

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी इमारतों, सड़कों या मशीनों में नहीं होती।

राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके जागरूक, शिक्षित, विवेकशील और चरित्रवान नागरिक होते हैं।

और ऐसे नागरिकों के निर्माण में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, न्यायाधीश, प्रशासक, सैनिक, पत्रकार, राजनेता, उद्योगपति और समाजसेवी—इन सभी के जीवन में कहीं न कहीं किसी शिक्षक की छाप होती है।

इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि—

"एक शिक्षक अकेला एक कक्षा नहीं बनाता, वह आने वाले कल का समाज बनाता है।"



एक शिक्षक के हाथ में केवल चॉक और किताब नहीं होती; उसके हाथ में पीढ़ियों का भविष्य होता है।

आज शिक्षक के सामने भी बड़ी चुनौतियां हैं

आज हम तकनीकी और मशीनी युग में प्रवेश कर चुके हैं। शिक्षा के साधन बदले हैं, तकनीक बदली है तथा बच्चों की सोच और चुनौतियां भी बदल गई हैं।

लेकिन शिक्षक की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

आज शिक्षक को केवल पढ़ाना ही नहीं, बल्कि बच्चों को डिजिटल दुनिया की चुनौतियों, तनाव, प्रतिस्पर्धा, भटकाव, नशे, हिंसा, अंधानुकरण और सामाजिक विभाजन के बीच सही दिशा भी प्रदान करनी है।

दुर्भाग्यवश, दूसरी ओर शिक्षक की गरिमा और मूल शैक्षणिक भूमिका कई बार प्रशासनिक एवं गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबती दिखाई देती है।

सरकारों और नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि शिक्षक को जितना अधिक गैर-शैक्षणिक दायित्वों से मुक्त किया जाएगा, उतना ही अधिक वह अपने मूल दायित्व—शिक्षा और विद्यार्थी-निर्माण—पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।

शिक्षा के बजट में पर्याप्त निवेश, विद्यालयों में बेहतर संसाधन, ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के शिक्षकों को आवश्यक सुविधाएं तथा शिक्षक के सामाजिक सम्मान को सुदृढ़ करना केवल शिक्षक हित का प्रश्न नहीं है।

यह राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न है।

ग्रामीण भारत का शिक्षक—अभावों में भविष्य की फसल उगाने वाला माली

ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में अनेक शिक्षक आज भी सीमित संसाधनों के बीच विद्यार्थियों के सपनों को उड़ान दे रहे हैं।

जहां संसाधनों की कमी होती है, वहां शिक्षक अपने उत्साह और समर्पण से उस कमी को पूरा करने का प्रयास करता है।

जहां किताबें कम होती हैं, वहां अनुभव शिक्षा का माध्यम बन जाता है।
जहां साधन सीमित होते हैं, वहां शिक्षक का संकल्प साधन बन जाता है।
जहां परिस्थितियां बच्चों के सपनों को रोकती हैं, वहां शिक्षक उनके हौसलों को पंख देता है।

ऐसे शिक्षक केवल नौकरी नहीं करते—वे पीढ़ियों का निर्माण करते हैं।

वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में सफल होना नहीं सिखाते, बल्कि जीवन की कठिन परीक्षाओं में भी धैर्य और आत्मविश्वास के साथ खड़े रहना सिखाते हैं।

शिक्षा नौकरी पाने का माध्यम नहीं, मनुष्य बनने की प्रक्रिया है

आज शिक्षा का अर्थ कई बार केवल प्रतियोगी परीक्षा, रोजगार और सरकारी नौकरी तक सीमित होता जा रहा है।

नौकरी आवश्यक है, रोजगार आवश्यक है और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी आवश्यक है—लेकिन शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं हो सकता।

शिक्षा का अंतिम उद्देश्य है—

विवेकशील मनुष्य।
संवेदनशील मनुष्य।
न्यायप्रिय मनुष्य।
जिम्मेदार नागरिक।
और सबसे बढ़कर—एक अच्छा इंसान।

यदि कोई व्यक्ति उच्च पद पर पहुंचकर भी अन्याय करता है, भ्रष्टाचार में लिप्त रहता है, कमजोरों का शोषण करता है और अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है, तो उसकी डिग्रियां भले ही बड़ी हों, लेकिन उसकी शिक्षा अधूरी है।

इसके विपरीत, यदि कोई साधारण व्यक्ति अपने ज्ञान का उपयोग समाज की भलाई, मानवता और राष्ट्र-निर्माण में करता है, तो उसकी शिक्षा वास्तव में सफल है।

यही वह अंतर है, जिसे एक सच्चा शिक्षक अपने विद्यार्थियों को समझाता है।

शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसके कितने विद्यार्थी बड़े पदों पर पहुंचे।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब उसका विद्यार्थी—

कमजोर के साथ खड़ा हो,





अन्याय के सामने आवाज उठाए,





सत्य का साथ दे,





अपने माता-पिता और समाज का सम्मान करे,





प्रकृति की रक्षा करे,





अपने कर्तव्यों को समझे,





अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहे,





और प्रत्येक व्यक्ति के साथ मानवता एवं सम्मान का व्यवहार करे।



जब विद्यार्थी के भीतर मानवता का दीप जलता है, तभी शिक्षक की तपस्या सफल होती है।

गुरु का दिया ज्ञान पीढ़ियों तक प्रकाश देता है

माता-पिता हमें जन्म देते हैं और जीवन का आधार प्रदान करते हैं।

शिक्षक हमारे जीवन को दिशा, विचार और विवेक देने का कार्य करता है।

माता-पिता हमें चलना सिखाते हैं,
शिक्षक बताते हैं कि किस दिशा में चलना है।

माता-पिता जीवन देते हैं,
शिक्षक जीवन को अर्थपूर्ण बनाने की राह दिखाता है।

इसीलिए भारतीय परंपरा में गुरु को अत्यंत सम्मान दिया गया है।

लेकिन गुरु का सम्मान केवल चरण स्पर्श करने या एक दिन फूल-माला अर्पित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

गुरु का वास्तविक सम्मान तब है, जब हम उसके ज्ञान को अपने आचरण में उतारें।

शिक्षक दिवस—सिर्फ बधाई का दिन नहीं, आत्ममंथन का दिन है

शिक्षक दिवस पर हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए—

"हैप्पी टीचर्स डे।"

बल्कि हमें स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में अच्छे इंसान बना रही है?

क्या हमारे विद्यालय बच्चों में विवेक और संवेदना विकसित कर रहे हैं?

क्या शिक्षक को वह सम्मान, स्वतंत्रता और संसाधन मिल रहे हैं, जिसके वे अधिकारी हैं?

क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी और प्रतियोगिता तक सीमित रह गया है?

क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल सफल बना रहे हैं या वास्तव में जिम्मेदार भी बना रहे हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर ही शिक्षक दिवस को सार्थक बनाएंगे।

एक शिक्षक की सफलता का वास्तविक प्रमाण

जब शिक्षक द्वारा पढ़ाया गया विद्यार्थी अपने जीवन में आगे बढ़कर समाज के लिए उपयोगी बनता है...

जब वह किसी पीड़ित की सहायता करता है...

जब वह अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है...

जब वह अपने पद का दुरुपयोग नहीं करता...

जब वह कमजोर को कुचलने के बजाय उसका हाथ थामता है...

जब वह ज्ञान को अहंकार नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाता है...

तब शिक्षक की शिक्षा सार्थक होती है।

क्योंकि शिक्षक द्वारा बोया गया ज्ञान का बीज जब चरित्र, विवेक और मानवता का वटवृक्ष बन जाता है, तब उसकी छाया में केवल एक विद्यार्थी नहीं, बल्कि पूरा समाज शांति और सम्मान का अनुभव करता है।

आइए, शिक्षक दिवस पर एक संकल्प लें

हम शिक्षक का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी भूमिका को समझकर करेंगे।

हम ऐसी शिक्षा की मांग करेंगे, जो रोजगार के साथ चरित्र दे,
प्रतिस्पर्धा के साथ संवेदना दे,
तकनीक के साथ विवेक दे,
अधिकार के साथ कर्तव्य दे,
और ज्ञान के साथ मानवता दे।

क्योंकि—

"डिग्री इंसान को योग्य बना सकती है,
लेकिन शिक्षक ही उस योग्यता को मानवता की दिशा दे सकता है।"



और अंत में—

गुरु वह दीप है, जो स्वयं जलकर दूसरों का मार्ग प्रकाशित करता है।
गुरु वह माली है, जो अपने पसीने से प्रतिभाओं को सींचता है।
गुरु वह शिल्पकार है, जो कच्ची मिट्टी से चरित्रवान नागरिक गढ़ता है।
गुरु वह मार्गदर्शक है, जो अंधकार में भी सत्य की राह दिखाता है।



**"जिसे गुरु के ज्ञान रूपी खजाने की प्राप्ति हो जाती है,

वह जीवन की कठिन राहों में भी मंजिल तलाश लेता है।
गुरु केवल मंजिल तक पहुंचना नहीं सिखाता,
वह यह भी सिखाता है कि मंजिल पर पहुंचकर इंसान कैसे बने रहना है।"**

शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर भारत की गुरु-शिक्षक परंपरा को शत-शत नमन।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से लेकर उन सभी ज्ञात-अज्ञात शिक्षकों, गुरुओं, समाज-सुधारकों और ज्ञान-साधकों को कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने अपने जीवन का सुख त्यागकर मानवता के निर्माण, चेतना के विकास और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए संघर्ष किया।

समस्त शिक्षक समाज को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं कोटी कोटी नमन साहेब बंदगी।

आपका अपना
रामलाल यादव राजस्थान
महन्त रामानंद साहेब झडस
( समाज सेवक /शिक्षाविद् | पत्रकार | आध्यात्मिक विश्लेषक)
मो. 8209466503

शिक्षकों के सम्मान से रोशन हुआ पचपेड़वा, जेएसआई स्कूल ने किया उत्कृष्ट शिक्षकों का सम्मान

पचपेड़वा, बलरामपुर। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह बच्चों के व्यक्तित्व को आकार देने और उन्हें जीवन की सही दिशा दिखाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी भावना के साथ शिक्षक दिवस के अवसर पर पचपेड़वा के पुरानी बाजार स्थित जेएसआई स्कूल में शिक्षक सम्मान समारोह आयोजित किया गया।

शनिवार को विद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम में क्षेत्र के उन शिक्षकों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने कार्य और समर्पण से अलग पहचान बनाई है। समारोह में शिक्षकों को 'डॉ. राधाकृष्णन एक्सीलेंट टीचर अवॉर्ड' प्रदान किए गए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर पंचायत पचपेड़वा के चेयरमैन रवि कुमार वर्मा रहे, जबकि सामाजिक कार्यकर्ता महबूब आलम खान ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में सहभागिता की।

पांच शिक्षकों को मिला सम्मान

समारोह के दौरान रवि कुमार वर्मा ने मो. अबुल लैस, श्रीमती पूनम, राम अशोक यादव, श्रीमती जरीना खातून और खेमराज चौरसिया को शॉल ओढ़ाकर, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किए। सम्मान प्राप्त करने वाले शिक्षकों के चेहरों पर खुशी और संतोष साफ दिखाई दिया।

इस अवसर पर विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए रवि कुमार वर्मा ने कहा कि शिक्षक किसी भी समाज की मजबूत नींव होते हैं। उनके अनुसार, एक शिक्षक का काम सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहता। वह बच्चों में अनुशासन, संस्कार, नैतिक मूल्यों और जीवन में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास पैदा करता है।

उन्होंने कहा कि समाज को बेहतर दिशा देने में शिक्षकों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है और उनके योगदान को सम्मान देना वास्तव में पूरे शिक्षा जगत का सम्मान है।

शिक्षा को सामाजिक बदलाव का आधार बताया

विशिष्ट अतिथि महबूब आलम खान ने शिक्षा को सामाजिक विकास की आधारशिला बताते हुए कहा कि किसी भी समाज की तरक्की का रास्ता शिक्षा से होकर गुजरता है। जब बच्चों को बेहतर शिक्षा और सही संस्कार मिलते हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देता है।

विद्यालय के प्रबंधक सगीर ए ख़ाकसार ने कहा कि शिक्षक सम्मान समारोह आयोजित करने के पीछे मुख्य उद्देश्य शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करना है। साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले शिक्षकों का उत्साह बढ़ाना भी इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

उन्होंने बताया कि जेएसआई स्कूल की ओर से लगातार तीन वर्षों से शिक्षक सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा है। विद्यालय प्रबंधन का मानना है कि शिक्षकों के योगदान को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किए जाने से समाज में शिक्षा और शिक्षक दोनों के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है।

विद्यालय परिवार की रही मौजूदगी

समारोह में विद्यालय के प्रिंसिपल आर.पी. श्रीवास्तव के साथ शबाना खान, इरफान अहमद, अभय वर्मा, किशन श्रीवास्तव, शारीबा, सुशील यादव, अंजलि, शिव कुमार रेगमी, दीपा, किशोर, सोबिया, शिव कुमार, शमा, जैनब, वंदना, सरस्वती, सचिन, लक्ष्मी, पूजा सहित विद्यालय परिवार से जुड़े अनेक लोग मौजूद रहे।

कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों के सम्मान के साथ विद्यार्थियों में भी अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव देखने को मिला। समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि शिक्षा की यात्रा में शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनके संस्कार और मार्गदर्शन का प्रभाव विद्यार्थियों के पूरे जीवन पर पड़ता है।

रिपोर्ट: सगीर ए ख़ाकसार
समझो भारत | शामली, उत्तर प्रदेश

इमाम जाफर -ए-सादिक की विलादत पर महफिल का कार्यक्रम आयोजित।

बिडौली/झिंझाना। नवासे -ए-रसूल इमाम जाफर -ए-सादिक अलैहिस्सलाम की विलादत पर इमाम बारगाह में उल्लास के साथ महफिल कार्यक्रम आयोजित की। महफिल का आगाज कुरआन ए पाक की तिलावत से किया गया। प्राप्त जानकारी के अनुसारमंगलवार की देर रात बिडौली सादात स्थित इमाम बारगाह में नवासे रसूल इमाम जाफर -ए-सादिक अलैहिस्सलाम की महफिल का आयोजन किया गया। महफिल की शुरुआत कुराने पाक की तिलावत से मौलाना आबिद हुसैन शाह ने की, जिसकी अध्यक्षता पूर्व प्रधान फजल अली उर्फ अच्छू मिया ने की। आयोजित महफिल में, सय्यद गुलाम अली, शहजाद शाह, रेहान हैदर, अली जोन, सय्यद अली रजा, दानियाल जैदी, सज्जाद ज़ैदी, कादिर अली, नफीस शाह,मोलाना हाशिम, आदि शायरों ने इमाम जाफर -ए-सादिक (अ.स.) की शान में कलाम और कसीदे पेश किए। महफिल में लंगर लगाया गया और लोगों को मिष्ठान व उपहार वितरित किए गए, इस मौके पर बच्चों एवं युवाओं में जोश देखने को मिला। सय्यद वसी हैदर ने इमाम जाफर-ए-सादिक अलैहिस्सलाम की जिंदगी पर प्रकाश डाला और उनके बारे विस्तार से जानकारी दी। महफिल में शुएब अखतर, खुर्रम जैदी, सम्मी शाह, नासिर अली, मोहम्मद अली, अम्मार हुसैन, साबिर शाह, सहजाद शाह,इब्ने हसन,मोहम्मद कासिम,हिलाल मेहदी,सय्यद मिन्हाल मेहदी,आफताब मेहदी, आदि मौजूद रहे।

दूध देना बंद किया तो ‘गौ माता’ से मुंह मोड़ लिया? बामनौली में घायल गाय की तस्वीर ने खड़े किए इंसानियत पर सवाल

जिस गाय ने वर्षों तक परिवार को दूध दिया, आज वही जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है—इलाज के लिए आगे आएं सरकार, प्रशासन, पशु चिकित्सक और गौसेवा संस्थाएं

शामली, उत्तर प्रदेश।
गाय को ‘गौ माता’ का दर्जा देने की बातें देशभर में होती हैं। गौवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों की ओर से योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार प्रदेश में हजारों गोवंश आश्रय स्थल और सैकड़ों वृहद गो-संरक्षण केंद्र संचालित हैं, जहां निराश्रित गोवंश को संरक्षण देने की व्यवस्था की गई है।

लेकिन इन तमाम दावों और व्यवस्थाओं के बीच शामली क्षेत्र के ग्राम बामनौली से सामने आया एक मामला कई असहज सवाल खड़े कर रहा है।

मामला एक ऐसी गाय का है, जिसके बारे में आरोप है कि उसने अपने जीवन का लंबा समय एक किसान परिवार के बीच बिताया। जब तक वह दूध देती रही, तब तक परिवार के लिए उपयोगी रही, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ जब उसने दूध देना बंद किया तो कथित तौर पर उसके प्रति परिवार का रवैया बदल गया।

आरोप है कि गाय को गंभीर रूप से घायल अवस्था में खुले में छोड़ दिया गया, जहां वह उपचार और सहारे के अभाव में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या दूध खत्म होते ही जिम्मेदारी भी खत्म हो गई?

किसी पशु का दूध देना बंद कर देना उसके जीवन का अंत नहीं होता।

वह पशु बूढ़ा हो सकता है, बीमार हो सकता है, कमजोर हो सकता है, लेकिन उसकी पीड़ा महसूस करने की क्षमता समाप्त नहीं होती।

यही वजह है कि बामनौली की इस गाय को लेकर उठ रही शिकायत केवल एक पशु की दुर्दशा का मामला नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनशीलता की परीक्षा भी है।

अगर किसी परिवार ने वर्षों तक किसी गाय को पाला और उससे दूध प्राप्त किया, तो क्या उसका दूध देना बंद कर देने के बाद उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?

और यदि गाय घायल थी तो उसे पशु चिकित्सक तक पहुंचाने, उसका उपचार कराने अथवा किसी गो-आश्रय स्थल में सुरक्षित पहुंचाने के बजाय खुले में छोड़ देना किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है?

गाय के मरने का इंतजार करने का भी आरोप

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और विचलित करने वाला पहलू यह आरोप है कि घायल गाय को खुले में छोड़ने के बाद भी उसकी स्थिति पर नजर रखी जा रही है और यह देखा जा रहा है कि वह कब तक जीवित रहती है।

इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि गाय की मृत्यु के बाद उसे दफनाने के लिए पहले से गड्ढा खोदकर रखा गया है।

यदि जांच में यह बात सही साबित होती है तो यह बेहद गंभीर मामला होगा।

किसी घायल जीव के लिए पहला कदम उसका इलाज और जीवन बचाने की कोशिश होना चाहिए, न कि उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा।

‘गौ सेवा’ केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित न रह जाए

गौ सेवा को लेकर देश में लंबे समय से धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा होती रही है। उत्तर प्रदेश में भी निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर गो-आश्रय स्थलों की व्यवस्था किए जाने की सरकारी जानकारी उपलब्ध है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार प्रदेश में हजारों गोवंश आश्रय स्थल संचालित हैं और बड़ी संख्या में गोवंश को वहां संरक्षण दिया जा रहा है।

ऐसे में बामनौली जैसे किसी गांव में यदि कोई गाय घायल अवस्था में सड़क या खुले स्थान पर पड़ी है, तो सवाल यह है कि स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार विभाग और पशु चिकित्सा व्यवस्था तक इसकी सूचना क्यों नहीं पहुंचनी चाहिए?

सरकार की व्यवस्था तभी सार्थक होगी जब उसका लाभ उस आखिरी और सबसे कमजोर पशु तक भी पहुंचे, जिसे बोलकर अपनी पीड़ा बताने की क्षमता नहीं है।

कानून भी पशु को अनावश्यक पीड़ा से बचाने की बात करता है

भारत में Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 पशुओं को अनावश्यक पीड़ा और suffering से बचाने के लिए कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है। अधिनियम में ऐसे प्रावधान भी हैं जिनमें मालिक द्वारा किसी बीमार या अशक्त पशु को उचित कारण के बिना सड़क पर मरने के लिए छोड़ना तथा दर्द या दुर्व्यवहार से पीड़ित पशु के संबंध में लापरवाही जैसे मामलों का उल्लेख है।

इसलिए यदि बामनौली की इस गाय के साथ क्रूरता या जानबूझकर लापरवाही किए जाने की पुष्टि होती है, तो मामले की निष्पक्ष जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई किया जाना जरूरी है।

Animal Welfare Board of India भी पशु क्रूरता की शिकायतों के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराता है और देशभर में पशु कल्याण कानूनों के पालन को बढ़ावा देना उसके दायित्वों में शामिल है।

अब सबसे पहले गाय को बचाने की जरूरत

इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि एक घायल जीव की जान बचाने की ओर जिम्मेदार विभागों और समाज का ध्यान आकर्षित करना है।

हमारी अपील है कि—

  • जिला प्रशासन शामली मामले का संज्ञान ले।
  • पशुपालन विभाग एवं संबंधित पशु चिकित्साधिकारी तत्काल गाय का स्वास्थ्य परीक्षण कराकर आवश्यक उपचार उपलब्ध कराएं।
  • आवश्यकता होने पर गाय को उचित गो-आश्रय/गौ संरक्षण केंद्र में सुरक्षित पहुंचाया जाए।
  • पुलिस एवं संबंधित विभाग उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामले की निष्पक्ष जांच करें।
  • यदि पशु क्रूरता या जानबूझकर लापरवाही की पुष्टि होती है तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
  • क्षेत्र की गौसेवा समितियां, पशु कल्याण संगठन और सामाजिक संस्थाएं आगे आकर इस गाय के उपचार और संरक्षण में सहयोग करें।
  • स्थानीय नागरिक भी अफवाहों के बजाय तथ्यों, फोटो-वीडियो और प्रत्यक्ष जानकारी के साथ जिम्मेदार अधिकारियों को सूचना दें।

‘गौ माता’ कहने से ज्यादा जरूरी है, संकट में उसके साथ खड़ा होना

गाय को माता कहने की परंपरा अपनी जगह है, लेकिन किसी जीव के प्रति सम्मान की असली परीक्षा तब होती है जब वह कमजोर हो, बीमार हो और किसी काम का न रह जाए।

जब तक गाय दूध देती रही तब तक उसकी सेवा और जब बूढ़ी हो गई तो उसका परित्याग—यदि बामनौली के इस मामले में यही सच है, तो यह केवल एक परिवार का सवाल नहीं बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ा एक आईना है।

गाय के नाम पर राजनीति हो, धर्म की चर्चा हो या गौ संरक्षण की योजनाएं—इन सबसे ऊपर एक सच्चाई है:

एक घायल जीव को दर्द हो रहा है। उसे इलाज चाहिए। उसे सहारा चाहिए। उसे बचाने की जरूरत है।

बामनौली की यह गाय बोल नहीं सकती।
वह अपनी शिकायत किसी अधिकारी के कार्यालय में जाकर दर्ज नहीं करा सकती।
वह अपने लिए न्याय की मांग नहीं कर सकती।

लेकिन इंसान बोल सकता है। प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। डॉक्टर इलाज कर सकते हैं। गौसेवा संस्थाएं आगे आ सकती हैं और समाज उसकी जान बचाने के लिए खड़ा हो सकता है।

अब देखना यह है कि बामनौली की इस घायल ‘गौ माता’ की पुकार जिम्मेदार लोगों तक कब पहुंचती है।


समझो भारत की अपील

केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन शामली, पशुपालन विभाग, स्थानीय पुलिस प्रशासन, पशु कल्याण बोर्ड, गौ संरक्षण केंद्रों, गौसेवा समितियों एवं सभी सामाजिक संस्थाओं से अपील है कि इस मामले को संवेदनशीलता के साथ लेते हुए पहले घायल गाय का तत्काल उपचार और संरक्षण सुनिश्चित कराया जाए तथा उसके बाद उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाए।

क्योंकि गौ सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण भाषण नहीं, बल्कि घायल और बेसहारा गाय के लिए समय पर उठाया गया कदम है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय समाचार पत्र/पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल “समझो भारत” के लिए शामली, उत्तर प्रदेश से पत्रकार ज़मीर आलम की खास रिपोर्ट।

संपर्क: 8010884848, 9528680561
वेबसाइट: www.samjhobharat.com 

*नोट: इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित अधिकारियों की जांच के बाद ही मानी जानी चाहिए। संबंधित पक्ष का बयान प्राप्त होने पर उसे भी खबर में उचित स्थान दिया जाएगा।*