केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट 2026-27 को लेकर देश के कई वर्गों में असंतोष दिखाई दे रहा है। खासकर किसानों और अधिवक्ताओं के लिए यह बजट उम्मीदों पर खरा उतरता नजर नहीं आता। अधिवक्ता सन्नी निर्वाल के अनुसार, यह बजट बड़े-बड़े दावों और आंकड़ों तक सीमित रहा, जबकि ज़मीनी हकीकत से जुड़ी समस्याओं पर सरकार की गंभीरता दिखाई नहीं दी।
किसानों के हिस्से आई मायूसी
किसान वर्ग के लिए इस बजट में सबसे बड़ी निराशा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर किसी भी तरह की कानूनी गारंटी का न होना है। इसके साथ ही PM-Kisan योजना की राशि में भी कोई बढ़ोतरी नहीं की गई, जबकि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
डीज़ल, खाद और बिजली जैसे जरूरी इनपुट्स पर कोई ठोस राहत न मिलने से किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सरकार ने योजनाओं की घोषणा तो की, लेकिन आय बढ़ाने और वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया।
अधिवक्ता वर्ग की अनदेखी
न्याय व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले अधिवक्ता वर्ग को भी इस बजट में पूरी तरह उपेक्षित रखा गया।
- न सामाजिक सुरक्षा योजना
- न स्वास्थ्य बीमा
- न पेंशन व्यवस्था
- और न ही चैंबर, लाइब्रेरी या न्यायिक ढांचे के सुदृढ़ीकरण के लिए कोई विशेष प्रावधान
कोविड काल में सबसे अधिक प्रभावित हुए अधिवक्ताओं की आर्थिक और पेशेवर समस्याओं को इस बजट में लगभग नजरअंदाज कर दिया गया।
न्याय व्यवस्था पर भी चुप्पी
न्यायालयों में बढ़ते लंबित मामलों, अधिवक्ताओं की आर्थिक असुरक्षा और आम नागरिक की न्याय तक पहुंच जैसे गंभीर मुद्दों पर भी बजट में कोई ठोस सोच दिखाई नहीं देती। यह स्थिति न केवल अधिवक्ताओं बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए चिंता का विषय है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, बजट 2026-27 किसानों और अधिवक्ताओं—दोनों के लिए आशा की जगह निराशा लेकर आया है। अधिवक्ता सन्नी निर्वाल का मानना है कि सरकार को इन वर्गों की वास्तविक समस्याओं को समझते हुए अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि नीतियां केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीनी स्तर पर भी असर दिखे।
शामली, उत्तर प्रदेश से
पत्रकार: सुरेन्द्र सिंह निर्वाल
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