“टैक्स भरोसे से आता है, डर से नहीं”बजट 2026 से एक करदाता की यथार्थवादी अपेक्षाएँ— डॉ. आकाश गुप्ता

शामली। बजट 2026 ऐसे समय में प्रस्तुत होने जा रहा है, जब देश का ईमानदार करदाता असमंजस और मानसिक दबाव से गुजर रहा है। समस्या टैक्स देने की नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की है जिसमें नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति बार-बार अपनी ईमानदारी साबित करने को मजबूर हो जाता है। आज स्थिति यह है कि रिटर्न फाइल करने के बाद भी करदाता निश्चिंत नहीं रह पाता—कब, किस आधार पर और किस वर्ष का नोटिस आ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। बजट 2026 से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि कर व्यवस्था को डर नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित बनाया जाए।

नोटिस कल्चर: भरोसे की सबसे बड़ी बाधा

वर्तमान कर प्रणाली में नोटिस कल्चर एक गंभीर समस्या बन चुका है। पोर्टल पर मामूली अंतर, तकनीकी mismatches या पुराने डेटा के आधार पर वर्षों पुराने मामलों में भी कार्रवाई शुरू हो जाती है। इससे करदाता का समय और संसाधन तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही विभाग और न्याय प्रणाली पर भी अनावश्यक बोझ बढ़ता है। बजट 2026 में स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि बिना ठोस साक्ष्य और वास्तविक कर-चोरी के मामलों के अलावा केवल सिस्टम-आधारित अंतर पर नोटिस और मांग जारी न की जाए।

GST और ITC: ईमानदार व्यापारी क्यों भुगते?

GST के अंतर्गत Input Tax Credit (ITC) को लेकर ईमानदार व्यापारियों में सबसे अधिक असुरक्षा है। करदाता के पास वैध इनवॉइस हो, भुगतान बैंक के माध्यम से किया गया हो और माल या सेवा का वास्तविक उपयोग हुआ हो—इसके बावजूद यदि सप्लायर ने टैक्स जमा नहीं किया, तो खरीदार की ITC रोक दी जाती है। यह न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक। बजट 2026 से अपेक्षा है कि कानून में यह स्पष्ट किया जाए कि bona fide assessee को सप्लायर की गलती की सज़ा न भुगतनी पड़े और विभाग पहले वास्तविक दोषी पर कार्रवाई करे।

MSME और छोटे व्यापारी: अपराधी नहीं, उद्यमी

छोटे व्यापारियों और MSME सेक्टर के लिए कर कानून आज भी भय का कारण बने हुए हैं। साधारण procedural चूक, लेट फाइलिंग या व्याख्या संबंधी मतभेदों को कई बार अपराध की तरह देखा जाता है। इससे उद्यमिता और जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित होती है। बजट 2026 में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गिरफ्तारी, भारी जुर्माना और आपराधिक कार्रवाई जैसे प्रावधान केवल गंभीर और जानबूझकर की गई कर-चोरी तक सीमित रहें—सामान्य व्यापारिक भूलों तक नहीं।

अपील और रिफंड: समय ही सबसे बड़ा कर है

अपील और रिफंड प्रक्रिया की धीमी गति करदाताओं के लिए एक और बड़ी चुनौती है। वर्षों तक अपील लंबित रहना या वैध रिफंड का अटक जाना सीधे तौर पर cash flow और business continuity को प्रभावित करता है। यदि करदाता से विलंब पर ब्याज वसूला जा सकता है, तो सरकार को भी रिफंड में देरी पर ब्याज देने के लिए बाध्य होना चाहिए। बजट 2026 में अपील निपटान और रिफंड जारी करने के लिए स्पष्ट, बाध्यकारी समय-सीमा तय करना अत्यंत आवश्यक है।

Presumptive Taxation: सरलता का वादा, जमीनी जटिलता

धारा 44AD और 44ADA जैसी Presumptive Taxation Schemes को सरलता के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन आज ये कई मामलों में वास्तविक कारोबार की प्रकृति से मेल नहीं खातीं। डिजिटल लेन-देन, कम मार्जिन वाले व्यवसाय और बदलते बिज़नेस मॉडल को देखते हुए इन प्रावधानों को अधिक व्यावहारिक और लचीला बनाने की जरूरत है, ताकि ईमानदार खुलासा करने वाला करदाता स्वयं को असुरक्षित महसूस न करे।

कर सलाहकार: सहयोगी, न कि संदेह का विषय

यह समझना भी जरूरी है कि हर कर सलाहकार या चार्टर्ड अकाउंटेंट कर-चोरी का माध्यम नहीं होता। वे कानून की जटिलताओं में करदाता का मार्गदर्शन करने वाले पेशेवर होते हैं। करदाता और सलाहकार के बीच भरोसे को कमजोर करना पूरे सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। बजट 2026 को इस सोच से ऊपर उठकर कर प्रशासन और पेशेवर समुदाय के बीच सहयोग और विश्वास को मजबूत करना चाहिए।

निष्कर्ष: डर नहीं, विश्वास

बजट 2026 से करदाता किसी असाधारण छूट या घोषणा की नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद कर प्रणाली की अपेक्षा कर रहा है। सरकार को यह याद रखना होगा कि टैक्स डर से नहीं, विश्वास से आता है। जब करदाता को लगेगा कि कानून उसके साथ है, तब compliance अपने-आप बढ़ेगी—और यही किसी भी सफल कर व्यवस्था की असली जीत होगी।


“समझो भारत” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के लिए
शामली, उत्तर प्रदेश से
पत्रकार: शौकीन सिद्दीकी की खास रिपोर्ट

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