मुजफ्फरनगर। कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़कर इंसान कुछ देर के लिए खामोश हो जाता है। यह कहानी भी ऐसी ही है—एक ऐसी महिला की, जिसने जिंदगी में शायद यह तय कर लिया है कि किसी इंसान को दुनिया से विदा होते समय अकेला नहीं छोड़ा जाएगा, चाहे इसके लिए उसे अपने गहने ही क्यों न बेचने पड़ें।
मुजफ्फरनगर की क्रांतिकारी शालू सैनी लंबे समय से लावारिस और बेसहारा मृतकों के अंतिम संस्कार की सेवा से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति का दुनिया में कोई अपना नहीं बचा, उसकी अंतिम विदाई के समय समाज को उसका अपना बन जाना चाहिए।
हाल ही में अलग-अलग पुलिस थानों से 6 लावारिस शवों की सूचना मिली। अंतिम संस्कार के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे समय में शालू सैनी ने अपने पैरों की पायल उतारकर बेच दी और उससे प्राप्त धनराशि से इन छह मृतकों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराया।
यह उनके लिए कोई पहला अवसर नहीं था। इससे पहले भी सेवा कार्य के लिए वह अपनी गले की चेन बेच चुकी हैं। उनका कहना है कि गहने दोबारा खरीदे जा सकते हैं, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानजनक विदाई देने का अवसर बार-बार नहीं मिलता, जिसके लिए दुनिया में कोई आगे आने वाला न हो।
बेटी की शादी के लिए खरीदा था प्लॉट, बना दिया आश्रय का ठिकाना
शालू सैनी की सेवा की कहानी केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए एक प्लॉट लिया था। लेकिन बेसहारा माताओं और जरूरतमंदों की पीड़ा देखकर उनका मन बदल गया। उन्होंने उसी जमीन पर वृद्धाश्रम और अनाथालय तैयार करने का निर्णय लिया।
उनके इस फैसले में एक अलग ही सोच दिखाई देती है—अपने परिवार की जरूरत से पहले उन लोगों की चिंता, जिनके पास अपना कहने वाला कोई नहीं।
धर्म से ऊपर इंसानियत
शालू सैनी का दावा है कि पिछले कई वर्षों में वह 6,000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करा चुकी हैं। इनमें अलग-अलग धर्मों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं और उनके अनुसार अंतिम संस्कार संबंधित धर्म की परंपराओं के अनुरूप कराया जाता है।
उनकी सेवा का मूल भाव किसी जाति, धर्म या पहचान से नहीं, बल्कि इंसान होने से जुड़ा है। किसी अज्ञात व्यक्ति की आखिरी यात्रा में शामिल होना शायद समाज के सबसे कठिन और भावनात्मक कामों में से एक है।
“पैसे आते-जाते रहते हैं, लेकिन सम्मान सबसे बड़ा धर्म है”
शालू सैनी कहती हैं, “जिसका इस दुनिया में कोई नहीं होता, उसके लिए हमें ही तो बनना पड़ेगा। पैसे आते-जाते रहते हैं, लेकिन किसी लावारिस इंसान को सम्मान देना सबसे बड़ा धर्म है।”
“जीते जी सेवा, मरने के बाद सम्मान।”
दरअसल, अंतिम संस्कार केवल किसी मृत शरीर को विदा करना नहीं होता। यह उस इंसान के प्रति समाज की आखिरी जिम्मेदारी भी है। जिस व्यक्ति की जिंदगी की कहानी हम नहीं जानते, उसकी मौत के बाद कम से कम इतना जरूर किया जा सकता है कि उसे सम्मान के साथ विदा किया जाए।
समाज से सहयोग की अपील
इतने बड़े स्तर पर सेवा कार्य अकेले किसी एक व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। अंतिम संस्कार, आश्रय और जरूरतमंदों की मदद जैसे कार्यों में संसाधनों की आवश्यकता होती है। शालू सैनी ने समाज के लोगों से इस सेवा अभियान में अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करने की अपील की है।
सहयोग एवं संपर्क: 8273189764
क्रांतिकारी शालू सैनी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, साक्षी वेलफेयर ट्रस्ट
“मुर्दों से प्रेम निभाना है”—एक सोच, जो समाज से सवाल करती है
हम अक्सर जीवन में अपने लोगों के लिए बहुत कुछ करने की बात करते हैं। लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति के लिए आगे आना, जिसका नाम तक हमें मालूम नहीं, शायद इंसानियत की सबसे कठिन परीक्षा है।
शालू सैनी की यह पहल समाज के सामने एक सवाल भी रखती है—अगर किसी इंसान के आखिरी सफर में उसके साथ चलने वाला कोई नहीं है, तो क्या समाज उसकी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त हो सकता है?
इस सवाल का उनका जवाब उनके काम में दिखाई देता है।
यह कहानी सिर्फ पायल बेचने की नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जिसमें इंसान की आखिरी जरूरत के सामने अपना सामान, अपना आराम और अपनी सुविधा छोटी लगने लगती है।
समझो भारत के लिए मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश से चीफ एडिटर ज़मीर आलम की विशेष रिपोर्ट।
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