असंवैधानिक एवं काला कानून यूजीसी विनियम 2026 : समानता के मूल अधिकार पर गंभीर प्रश्न

✍️ विशेष रिपोर्ट | शामली, उत्तर प्रदेश। अखिल भारत वर्षीय ब्राह्मण सभा (पंजीकृत) ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लागू किए गए नए विनियम “उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026” को असंवैधानिक बताते हुए इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारियों एवं वक्ताओं का कहना है कि यह विनियम भारतीय संविधान की मूल भावना—समानता के अधिकार—के विपरीत है।

संविधान बनाम नया विनियम

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 प्रत्येक नागरिक को समानता का मूल अधिकार प्रदान करते हैं। यही अधिकार भारत गणराज्य की प्रभुता, अखंडता और लोकतांत्रिक ढांचे की नींव हैं। वक्ताओं का कहना है कि स्वतंत्रता के बाद से सरकारों ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु अनेक योजनाएं चलाईं, जिनमें आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं भी शामिल रहीं।

परंतु समय के साथ एक बड़ा वर्ग—सवर्ण समाज—धीरे-धीरे इन नीतियों की परिधि से बाहर होता चला गया। आरोप है कि जो वर्ग अब सामाजिक व शैक्षिक रूप से सशक्त हो चुके हैं, वे आज भी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, जबकि योग्यता-आधारित अवसरों में सवर्ण समाज लगातार पीछे धकेला जा रहा है।

शिक्षा में योग्यता बनाम वर्ग

शिक्षा को किसी भी राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला माना जाता है, लेकिन आरोप है कि आज उच्च शिक्षा संस्थानों में योग्यता के स्थान पर जाति एवं वर्ग को प्राथमिकता दी जा रही है। इसी क्रम में सरकार द्वारा लाया गया नया यूजीसी विनियम 2026, पूर्व के 2012 के विनियम को निरस्त करता हुआ प्रतीत होता है।

इस नए विनियम को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह है कि भेदभाव की शिकायत करने का अधिकार केवल अनुसूचित एवं पिछड़े वर्गों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि यदि किसी सवर्ण छात्र पर झूठा आरोप लगाया जाता है और वह सिद्ध नहीं होता, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

झूठे आरोप और कानूनी असंतुलन

सभा के वक्ताओं ने एससी-एसटी एक्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य भेदभाव रोकना था, लेकिन इसके दुरुपयोग के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। अब यूजीसी का यह नया विनियम उसी असंतुलन को उच्च शिक्षा में दोहराने का प्रयास करता प्रतीत होता है।

उनका कहना है कि यह व्यवस्था सवर्ण छात्रों को मानसिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से असुरक्षित बनाती है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार को कमजोर करती है।

“नया विभाजन और सामाजिक तनाव”

अखिल भारत वर्षीय ब्राह्मण सभा ने इस विनियम को “काला कानून” करार देते हुए आरोप लगाया कि यह समाज को वर्गों में बांटने, देश में नए प्रकार के विभाजन को जन्म देने और सामाजिक तनाव को बढ़ावा देने वाला है। वक्ताओं ने इसे राष्ट्रीय एकता के लिए घातक बताया।

सरकार से पुरज़ोर अपील

सभा की ओर से केंद्र सरकार से मांग की गई कि

“यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026” को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए,
क्योंकि यह न केवल असंवैधानिक है बल्कि समानता के मूल अधिकार पर भी कुठाराघात करता है।

नागरिकों से आह्वान

संगठन ने देश के समस्त सम्मानित नागरिकों से अपील की है कि वे इस विनियम पर गंभीरता से विचार करें और लोकतांत्रिक तरीके से अपने विचार प्रकट करें, ताकि भविष्य की शिक्षा प्रणाली निष्पक्ष, संतुलित और संविधानसम्मत बनी रहे।


📌 नोट:
यह लेख विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों पर आधारित है। लोकतंत्र में संवाद, बहस और संवैधानिक समीक्षा ही किसी भी नीति की मजबूती का आधार होती है।


✍️ विशेष रिपोर्ट

सुरेन्द्र सिंह निर्वाल
समझो भारत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका
शामली, उत्तर प्रदेश

📞 8010884848
🌐 www.samjhobharat.com
📧 samjhobharat@gmail.com

#samjhobharat 

No comments:

Post a Comment