दूध देना बंद किया तो ‘गौ माता’ से मुंह मोड़ लिया? बामनौली में घायल गाय की तस्वीर ने खड़े किए इंसानियत पर सवाल

जिस गाय ने वर्षों तक परिवार को दूध दिया, आज वही जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है—इलाज के लिए आगे आएं सरकार, प्रशासन, पशु चिकित्सक और गौसेवा संस्थाएं

शामली, उत्तर प्रदेश।
गाय को ‘गौ माता’ का दर्जा देने की बातें देशभर में होती हैं। गौवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों की ओर से योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार प्रदेश में हजारों गोवंश आश्रय स्थल और सैकड़ों वृहद गो-संरक्षण केंद्र संचालित हैं, जहां निराश्रित गोवंश को संरक्षण देने की व्यवस्था की गई है।

लेकिन इन तमाम दावों और व्यवस्थाओं के बीच शामली क्षेत्र के ग्राम बामनौली से सामने आया एक मामला कई असहज सवाल खड़े कर रहा है।

मामला एक ऐसी गाय का है, जिसके बारे में आरोप है कि उसने अपने जीवन का लंबा समय एक किसान परिवार के बीच बिताया। जब तक वह दूध देती रही, तब तक परिवार के लिए उपयोगी रही, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ जब उसने दूध देना बंद किया तो कथित तौर पर उसके प्रति परिवार का रवैया बदल गया।

आरोप है कि गाय को गंभीर रूप से घायल अवस्था में खुले में छोड़ दिया गया, जहां वह उपचार और सहारे के अभाव में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या दूध खत्म होते ही जिम्मेदारी भी खत्म हो गई?

किसी पशु का दूध देना बंद कर देना उसके जीवन का अंत नहीं होता।

वह पशु बूढ़ा हो सकता है, बीमार हो सकता है, कमजोर हो सकता है, लेकिन उसकी पीड़ा महसूस करने की क्षमता समाप्त नहीं होती।

यही वजह है कि बामनौली की इस गाय को लेकर उठ रही शिकायत केवल एक पशु की दुर्दशा का मामला नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनशीलता की परीक्षा भी है।

अगर किसी परिवार ने वर्षों तक किसी गाय को पाला और उससे दूध प्राप्त किया, तो क्या उसका दूध देना बंद कर देने के बाद उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?

और यदि गाय घायल थी तो उसे पशु चिकित्सक तक पहुंचाने, उसका उपचार कराने अथवा किसी गो-आश्रय स्थल में सुरक्षित पहुंचाने के बजाय खुले में छोड़ देना किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है?

गाय के मरने का इंतजार करने का भी आरोप

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और विचलित करने वाला पहलू यह आरोप है कि घायल गाय को खुले में छोड़ने के बाद भी उसकी स्थिति पर नजर रखी जा रही है और यह देखा जा रहा है कि वह कब तक जीवित रहती है।

इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि गाय की मृत्यु के बाद उसे दफनाने के लिए पहले से गड्ढा खोदकर रखा गया है।

यदि जांच में यह बात सही साबित होती है तो यह बेहद गंभीर मामला होगा।

किसी घायल जीव के लिए पहला कदम उसका इलाज और जीवन बचाने की कोशिश होना चाहिए, न कि उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा।

‘गौ सेवा’ केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित न रह जाए

गौ सेवा को लेकर देश में लंबे समय से धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा होती रही है। उत्तर प्रदेश में भी निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर गो-आश्रय स्थलों की व्यवस्था किए जाने की सरकारी जानकारी उपलब्ध है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार प्रदेश में हजारों गोवंश आश्रय स्थल संचालित हैं और बड़ी संख्या में गोवंश को वहां संरक्षण दिया जा रहा है।

ऐसे में बामनौली जैसे किसी गांव में यदि कोई गाय घायल अवस्था में सड़क या खुले स्थान पर पड़ी है, तो सवाल यह है कि स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार विभाग और पशु चिकित्सा व्यवस्था तक इसकी सूचना क्यों नहीं पहुंचनी चाहिए?

सरकार की व्यवस्था तभी सार्थक होगी जब उसका लाभ उस आखिरी और सबसे कमजोर पशु तक भी पहुंचे, जिसे बोलकर अपनी पीड़ा बताने की क्षमता नहीं है।

कानून भी पशु को अनावश्यक पीड़ा से बचाने की बात करता है

भारत में Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 पशुओं को अनावश्यक पीड़ा और suffering से बचाने के लिए कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है। अधिनियम में ऐसे प्रावधान भी हैं जिनमें मालिक द्वारा किसी बीमार या अशक्त पशु को उचित कारण के बिना सड़क पर मरने के लिए छोड़ना तथा दर्द या दुर्व्यवहार से पीड़ित पशु के संबंध में लापरवाही जैसे मामलों का उल्लेख है।

इसलिए यदि बामनौली की इस गाय के साथ क्रूरता या जानबूझकर लापरवाही किए जाने की पुष्टि होती है, तो मामले की निष्पक्ष जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई किया जाना जरूरी है।

Animal Welfare Board of India भी पशु क्रूरता की शिकायतों के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराता है और देशभर में पशु कल्याण कानूनों के पालन को बढ़ावा देना उसके दायित्वों में शामिल है।

अब सबसे पहले गाय को बचाने की जरूरत

इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि एक घायल जीव की जान बचाने की ओर जिम्मेदार विभागों और समाज का ध्यान आकर्षित करना है।

हमारी अपील है कि—

  • जिला प्रशासन शामली मामले का संज्ञान ले।
  • पशुपालन विभाग एवं संबंधित पशु चिकित्साधिकारी तत्काल गाय का स्वास्थ्य परीक्षण कराकर आवश्यक उपचार उपलब्ध कराएं।
  • आवश्यकता होने पर गाय को उचित गो-आश्रय/गौ संरक्षण केंद्र में सुरक्षित पहुंचाया जाए।
  • पुलिस एवं संबंधित विभाग उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामले की निष्पक्ष जांच करें।
  • यदि पशु क्रूरता या जानबूझकर लापरवाही की पुष्टि होती है तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
  • क्षेत्र की गौसेवा समितियां, पशु कल्याण संगठन और सामाजिक संस्थाएं आगे आकर इस गाय के उपचार और संरक्षण में सहयोग करें।
  • स्थानीय नागरिक भी अफवाहों के बजाय तथ्यों, फोटो-वीडियो और प्रत्यक्ष जानकारी के साथ जिम्मेदार अधिकारियों को सूचना दें।

‘गौ माता’ कहने से ज्यादा जरूरी है, संकट में उसके साथ खड़ा होना

गाय को माता कहने की परंपरा अपनी जगह है, लेकिन किसी जीव के प्रति सम्मान की असली परीक्षा तब होती है जब वह कमजोर हो, बीमार हो और किसी काम का न रह जाए।

जब तक गाय दूध देती रही तब तक उसकी सेवा और जब बूढ़ी हो गई तो उसका परित्याग—यदि बामनौली के इस मामले में यही सच है, तो यह केवल एक परिवार का सवाल नहीं बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ा एक आईना है।

गाय के नाम पर राजनीति हो, धर्म की चर्चा हो या गौ संरक्षण की योजनाएं—इन सबसे ऊपर एक सच्चाई है:

एक घायल जीव को दर्द हो रहा है। उसे इलाज चाहिए। उसे सहारा चाहिए। उसे बचाने की जरूरत है।

बामनौली की यह गाय बोल नहीं सकती।
वह अपनी शिकायत किसी अधिकारी के कार्यालय में जाकर दर्ज नहीं करा सकती।
वह अपने लिए न्याय की मांग नहीं कर सकती।

लेकिन इंसान बोल सकता है। प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। डॉक्टर इलाज कर सकते हैं। गौसेवा संस्थाएं आगे आ सकती हैं और समाज उसकी जान बचाने के लिए खड़ा हो सकता है।

अब देखना यह है कि बामनौली की इस घायल ‘गौ माता’ की पुकार जिम्मेदार लोगों तक कब पहुंचती है।


समझो भारत की अपील

केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन शामली, पशुपालन विभाग, स्थानीय पुलिस प्रशासन, पशु कल्याण बोर्ड, गौ संरक्षण केंद्रों, गौसेवा समितियों एवं सभी सामाजिक संस्थाओं से अपील है कि इस मामले को संवेदनशीलता के साथ लेते हुए पहले घायल गाय का तत्काल उपचार और संरक्षण सुनिश्चित कराया जाए तथा उसके बाद उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाए।

क्योंकि गौ सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण भाषण नहीं, बल्कि घायल और बेसहारा गाय के लिए समय पर उठाया गया कदम है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय समाचार पत्र/पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल “समझो भारत” के लिए शामली, उत्तर प्रदेश से पत्रकार ज़मीर आलम की खास रिपोर्ट।

संपर्क: 8010884848, 9528680561
वेबसाइट: www.samjhobharat.com 

*नोट: इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित अधिकारियों की जांच के बाद ही मानी जानी चाहिए। संबंधित पक्ष का बयान प्राप्त होने पर उसे भी खबर में उचित स्थान दिया जाएगा।*

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