शामली।
हिंदी भारत की वह मधुर भाषा है, जिसका हर शब्द आत्मा को छू लेने की शक्ति रखता है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। हिंदी को देववाणी भी कहा गया है और इसे भारत माता का अनुपम शृंगार माना जाता है।
सागर की लहरों की चंचलता में जो सौंदर्य झलकता है, वही हिंदी की परिभाषा है। लेकिन विडंबना यह है कि आज हिंदी धीरे-धीरे केवल साहित्यिक आयोजनों और कवि सम्मेलनों तक सीमित होती जा रही है। राष्ट्रभाषा होने के बावजूद सरकारी कार्यालयों और कई विद्यालयों में इसका प्रयोग औपचारिकता तक सिमटकर रह गया है।
आज जब पूरा संसार नई तकनीकों और भाषाओं में खोता जा रहा है, ऐसे में कुछ संवेदनशील कवि और साहित्यकार ही हैं जो हिंदी की महिमा को बचाए हुए हैं। कवि की पीड़ा इन दो पंक्तियों में स्पष्ट होती है—
परदेश में रहने की मुझे ये सज़ा मिली,
रोने लगा मैं हिंदी का अखबार देख कर।।
हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीयता की पहचान है। यह हमारी आत्मा में बसती है और हमारे संस्कारों की धड़कन है। इसे सीमित आयोजनों से बाहर निकालकर प्रत्येक सरकारी दफ्तर, विद्यालय और जनमानस तक पहुँचाना समय की मांग है।
👉 हिंदी के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी केवल कवियों और साहित्यकारों पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर है। यही हमारी संस्कृति की रक्षा और भारत की असली पहचान होगी।
📍 शामली, उत्तर प्रदेश से
ब्यूरो-चीफ: शौकिन सिद्दीकी
कैमरा मैन: रामकुमार चौहान
राष्ट्रीय समाचार पत्रिका
"समझो भारत"
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