मध्य प्रदेश। स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरी चोट करने वाली सनसनीखेज घटना सामने आई है। प्रदेश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित एमवाय अस्पताल में चूहों ने दो मासूम बच्चों की जिंदगी छीन ली। करोड़ों रुपए के बजट, लाखों रुपए हर महीने पेस्ट कंट्रोल पर खर्च और बड़े-बड़े दावों के बावजूद अस्पताल की हालत इतनी बदहाल है कि संवेदनशील नीकू वार्ड में भी चूहे खुलेआम यमराज बनकर घूम रहे हैं। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी और भ्रष्टाचार का नतीजा है।
जानकारी के मुताबिक, अस्पताल में हर महीने 1.5 से 2.5 करोड़ रुपए पेस्ट कंट्रोल पर खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद चूहों ने दो मासूमों को कुतरकर मौत के घाट उतार दिया। जिम्मेदारों ने इस पर भी शर्मनाक रवैया अपनाया। निजी कंपनी पर केवल एक लाख रुपए का जुर्माना ठोंका गया और मामला रफा-दफा करने की कोशिश शुरू हो गई। सवाल उठता है कि क्या दो मासूमों की जान की कीमत सिर्फ एक लाख रुपए है?
सबसे बड़ा विवाद अस्पताल प्रशासन के रवैये को लेकर है। डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया और अधीक्षक डॉ. अशोक यादव जैसे जिम्मेदार अफसरों को केवल नोटिस थमा दिया गया। पीडियाट्रिक सर्जरी यूनिट के हेड डॉ. ब्रजेश लाहोटी परिवार संग छुट्टियां मनाने में व्यस्त रहे और यूनिट के प्रभार में रहे डॉ. मनोज जोशी भी छुट्टी पकड़कर निकल लिए। मतलब जिनके कंधों पर बच्चों की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी थी, वे मौज-मस्ती में डूबे रहे और मासूम मौत के मुंह में चले गए। सिर्फ भवन प्रभारी को निलंबित कर खानापूर्ति की गई, जबकि असली गुनाहगारों को बचाने की कोशिशें तेज़ हो गईं।
घटना के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जांच कमिटी बनाने का ऐलान किया और कड़े शब्दों में नाराजगी जताई। लेकिन स्वास्थ्य मंत्री और डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल अब तक चुप्पी साधे हैं। कलेक्टर का बयान तो और भी विवादित है। उन्होंने कहा कि बच्चों की मौत चूहों से नहीं, गंभीर बीमारी से हुई है। सवाल यह है कि अगर मौत बीमारी से भी हुई तो अस्पताल के नीकू वार्ड में चूहों का खुला घूमना किसकी जिम्मेदारी है? क्या मासूमों की मौत को बीमारी के नाम पर दबाने की कोशिश हो रही है?
यह कोई पहली घटना नहीं है। 2017 में शिवपुरी में नवजात की उंगली, 2016 में भोपाल में बच्चे की आंख, 2015 में धार में मासूम की नाक और 2021 में इसी एमवाय अस्पताल में 19 दिन के बच्चे का पैर चूहों ने कुतर डाला था। हर बार जांच कमिटी बनी, हर बार नोटिस दिए गए और हर बार मामला ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन मासूमों की जान वापस नहीं आई।
प्रदेश का स्वास्थ्य बजट इस साल 23,533 करोड़ रुपए है, जो पिछले साल से दो हजार करोड़ ज्यादा है। इसके बावजूद अस्पतालों की हालत इतनी दयनीय है कि शव को एंबुलेंस की बजाय खाट या बाइक पर ढोना पड़ता है, ड्रिप लगाने का स्टैंड नहीं मिलता और डॉक्टर ड्यूटी से नदारद रहते हैं। करोड़ों रुपए का बजट आखिर कहां जा रहा है, यह सबसे बड़ा सवाल है।
दो मासूमों की दर्दनाक मौत ने साफ कर दिया है कि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ नोटिस और सस्पेंशन का नाटक होता है। जनता का सवाल अब सीधा है – जब चूहे अस्पतालों में यमराज बनकर मासूमों की जिंदगी निगल रहे हैं तो जिम्मेदार अफसर और डॉक्टर छुट्टियों में मस्त कैसे रह सकते हैं?
यह रिपोर्ट सिर्फ मौत की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की लापरवाही का आईना है जिसमें करोड़ों खर्च होने के बावजूद गरीब की औलाद चूहों का निवाला बन जाती है।
रिपोर्ट - गुलवेज़ आलम कैराना
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