✍️ पप्पू राणा, समझो भारत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, कच्ची गढ़ी (जिला शामली, उत्तर प्रदेश)
बरसात का मौसम ग्रामीण जीवन पर अक्सर कहर बनकर टूटता है। गढीपुख्ता क्षेत्र के कच्ची गढ़ी गांव में घटी ताज़ा घटना ने एक बार फिर इस सच्चाई को उजागर कर दिया। मंगलवार की रात से लगातार हो रही बारिश ने मांगेराम सैनी के घर की कमजोर छत को और जर्जर बना दिया। बुधवार तड़के जब उनकी पत्नी पशुओं को चारा डालने गईं, तभी अचानक पूरी छत भरभराकर गिर गई।
महिला किसी तरह भागकर अपनी जान तो बचा ली, लेकिन मलबे के नीचे दबकर मांगेराम की दोनों भैंसों की मौत हो गई। इनमें से एक दुधारू थी, जिसके दूध पर ही परिवार की आजीविका निर्भर थी। अचानक हुई इस घटना से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।प्रशासन पर सवाल
गांव के लोगों का आरोप है कि घटना की जानकारी भाजपा नेता सूर्यप्रताप सैनी ने तुरंत लेखपाल को दी थी, लेकिन इसके बावजूद कोई अधिकारी या कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। ग्रामीणों का गुस्सा साफ था—“जब पीड़ित को राहत और सांत्वना की ज़रूरत है, तब प्रशासन गायब क्यों है?”
टूटे सपने और संघर्ष
मांगेराम मेहनत-मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके लिए ये भैंसें केवल पशु नहीं थीं, बल्कि रोज़गार और जीवनयापन का सहारा थीं। अब अचानक उनका सहारा छिन गया है। परिजन और ग्रामीण मलबे के पास बैठकर रोते रहे, और आंखों में सवाल था—“क्या सरकार इस पीड़ा की भरपाई कर पाएगी?”
ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों ने ज़िला प्रशासन से गुहार लगाई है कि मांगेराम सैनी को उचित आर्थिक सहायता दी जाए ताकि उनका परिवार इस संकट की घड़ी से निकल सके।
बरसात थमने का नाम नहीं ले रही, और ऐसी घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ग्रामीण इलाकों में आपदा प्रबंधन केवल कागजों तक ही सीमित है?
📌 यह ख़ास रिपोर्ट "समझो भारत" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के लिए कच्ची गढ़ी से पत्रकार पप्पू राणा द्वारा भेजी गई है।
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