समझो भारत | राष्ट्रीय समाचार पत्र/पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल
“जब श्रद्धा के साथ स्वाभिमान, समानता और स्वतंत्रता का सवाल सामने आए, तब हमें क्या करना चाहिए?”
महंत रामानंद साहेब झड़स का यह सवाल केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और आत्मसम्मान से जुड़ा एक गंभीर विचार है। उनके अनुसार पंथ श्री हजुर आचार्य अर्धनाम साहेब के विश्व बंधुत्व तथा सद्गुरु कबीर के आत्मखोज और मानवतावादी संदेश को समझने की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है।
बुद्ध से लेकर संत कबीर, संत रविदास और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर तक अनेक सामाजिक चिंतकों और महापुरुषों ने मनुष्य की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता पर जोर दिया। उनके विचारों की मूल भावना यही रही कि जन्म, जाति, सामाजिक स्थिति या किसी अन्य पहचान के आधार पर किसी मनुष्य को दूसरे से छोटा-बड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
श्रद्धा हो, लेकिन विवेक के साथ
समाज में श्रद्धा का अपना महत्व है। लोग धार्मिक परंपराओं, संतों और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान रखते हैं। लेकिन श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपना विवेक किसी दूसरे के हाथों सौंप दे।
किसी भी विचार, परंपरा या धार्मिक व्यवस्था को समझने के लिए सवाल करना गलत नहीं है। बल्कि कई बार सवाल ही व्यक्ति को सत्य के करीब ले जाते हैं।
यही कारण है कि समाज के सामने यह विचार रखने की जरूरत है कि क्या कहीं भेदभाव की पुरानी मानसिकता नए धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक रूपों में तो कायम नहीं है?
भेदभाव हमेशा खुले तौर पर दिखाई दे, यह जरूरी नहीं। कभी वह परंपरा के नाम पर सामने आता है, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर और कभी धार्मिक पदवी या कर्मकांड के आवरण में।
ऐसे में जरूरी है कि भावनाओं के साथ-साथ विवेक का भी इस्तेमाल किया जाए।
अगर सहयोग स्वीकार है तो सम्मान क्यों नहीं?
समाज में अक्सर धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को लोग श्रद्धा और विश्वास के कारण अन्न, आर्थिक सहयोग, राशन अथवा अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।
यह सहयोग समाज की उदारता और श्रद्धा का प्रतीक है।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति या समूह को समाज का सहयोग स्वीकार है, तो उसी समाज के प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और बराबरी को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक होना चाहिए।
सवाल बिल्कुल सरल है—
अगर हमारा अन्न स्वीकार है तो हमारा सम्मान क्यों नहीं?
अगर हमारा सहयोग स्वीकार है तो हमारे साथ बराबरी का व्यवहार क्यों नहीं?
अगर हमारी श्रद्धा स्वीकार है तो हमारी मानवीय गरिमा का सम्मान क्यों नहीं?
इन सवालों का उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार में समानता की कसौटी को सामने रखना है।
व्यक्ति नहीं, मानसिकता पर सवाल
किसी व्यक्ति की जाति, वेशभूषा, धार्मिक पहचान या पदवी उसे दूसरे मनुष्य से ऊपर नहीं बनाती।
सम्मान विचारों का हो सकता है, आचरण का हो सकता है और मानवता का हो सकता है। लेकिन यदि कहीं मनुष्य को जन्म या पहचान के आधार पर छोटा समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तो उस पर शांतिपूर्ण और तर्कपूर्ण सवाल उठना स्वाभाविक है।
समाज को किसी व्यक्ति के खिलाफ नफरत या बहिष्कार का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। इसके बजाय उसके विचार और आचरण को परखना चाहिए।
क्या वह समानता की बात करता है?
क्या वह शिक्षा और स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित करता है?
क्या वह समाज को जोड़ने का प्रयास करता है?
क्या वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक अधिकारों की जानकारी देता है?
या वह लोगों को अंधानुकरण और निर्भरता की ओर ले जाता है?
यही कसौटी अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
कबीर, रविदास, बुद्ध और आंबेडकर की चेतना
संत कबीर ने अपने समय में पाखंड और बाहरी आडंबर पर सवाल उठाए। संत रविदास ने ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें मनुष्य के साथ भेदभाव न हो। बुद्ध ने करुणा, प्रज्ञा और समता पर बल दिया। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक अधिकारों को आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार बनाया।
इन विचारों को केवल पुस्तकों या भाषणों तक सीमित रखने के बजाय जीवन में उतारने की जरूरत है।
यदि हम किसी महापुरुष को अपना मार्गदर्शक मानते हैं, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में उनके मूल विचार कितने दिखाई देते हैं।
सवाल करना जागृति है
सवाल करना अपराध नहीं है।
सवाल करना जागृति है।
विवेक करना कमजोरी नहीं है।
विवेक करना स्वाभिमान है।
किसी दावे को प्रमाण के आधार पर परखना धर्म या परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि स्वस्थ सामाजिक सोच का हिस्सा है।
आज के दौर में समाज को शिक्षा के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक चेतना की भी आवश्यकता है। बच्चों को केवल परंपराएँ याद कराने के बजाय उन्हें यह भी सिखाना होगा कि वे किसी भी बात को समझें, प्रश्न करें और तथ्य के आधार पर अपना निर्णय लें।
समाज की ताकत संख्या से ज्यादा चेतना में है
किसी समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी जनसंख्या में नहीं होती।
उसकी असली ताकत होती है—
शिक्षा, संगठन, जागरूकता, स्वाभिमान, स्वतंत्र सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक चेतना।
जो समाज सवाल करना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे अपने निर्णय लेने की क्षमता दूसरों को सौंप सकता है।
इसलिए समाज को यह तय करना होगा कि श्रद्धा और विवेक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ चल सकते हैं।
दान देना मानवता है।
सहयोग करना उदारता है।
श्रद्धा रखना अधिकार है।
लेकिन अपने अपमान को स्वीकार करना किसी की मजबूरी नहीं होना चाहिए।
भेदभाव के खिलाफ रास्ता संविधान का हो
यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक भेदभाव का सामना करना पड़ता है तो प्रतिक्रिया हिंसा, नफरत या भीड़ के रूप में नहीं होनी चाहिए।
पहले तथ्य जुटाए जाएँ।
स्थिति को समझा जाए।
सच्चाई की पुष्टि की जाए।
शांतिपूर्ण तरीके से सवाल किया जाए।
और आवश्यकता होने पर कानून तथा संवैधानिक संस्थाओं की मदद ली जाए।
यही लोकतांत्रिक और जिम्मेदार रास्ता है।
हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति या धर्म को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर सवाल उठाना होना चाहिए जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से छोटा समझती है।
बच्चों को श्रद्धा के साथ स्वाभिमान भी सिखाइए
आज की पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि सम्मान दो और सम्मान लो।
किसी से घृणा मत करो।
किसी के साथ अन्याय मत करो।
लेकिन अपने साथ होने वाले अन्याय को भी सामान्य मत मानो।
गलत का जवाब हिंसा से नहीं, ज्ञान से दो।
नफरत से नहीं, समानता से दो।
अंधविश्वास से नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दो।
और किसी परंपरा को केवल इसलिए सही मत मानो कि वह बहुत पुरानी है। उसे समझिए, परखिए और उसके मानवीय प्रभाव पर विचार कीजिए।
असली जागरण भीतर से शुरू होता है
सद्गुरु कबीर की चेतना का एक महत्वपूर्ण पहलू आत्मबोध भी है।
दूसरों की गलतियाँ तलाशने से पहले स्वयं के भीतर झाँकना भी जरूरी है।
क्या मैं स्वयं किसी दूसरे मनुष्य को छोटा समझता हूँ?
क्या मैं किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान के आधार पर अलग व्यवहार करता हूँ?
क्या मैं अपने लिए समानता चाहता हूँ लेकिन दूसरों को समान अधिकार देने में संकोच करता हूँ?
यदि हम इन सवालों का ईमानदारी से जवाब तलाश लें, तो सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत वास्तव में हमारे भीतर से हो सकती है।
जागो समाज, लेकिन नफरत के लिए नहीं
समाज को जागना है, लेकिन किसी के खिलाफ नफरत के लिए नहीं।
जागना है अपने अधिकारों के लिए।
जागना है अपने स्वाभिमान के लिए।
जागना है शिक्षा के लिए।
जागना है समानता के लिए।
जागना है वैज्ञानिक सोच के लिए।
और जागना है उस हर मानसिकता के खिलाफ, जो मनुष्य को मनुष्य से कमतर समझती है।
महंत रामानंद साहेब झड़स का संदेश इसी व्यापक सामाजिक चेतना की ओर संकेत करता है कि श्रद्धा के साथ विवेक, धर्म के साथ मानवता और परंपरा के साथ प्रश्न करने की क्षमता भी जरूरी है।
किसी व्यक्ति की बात केवल इसलिए स्वीकार न करें कि उसके नाम के साथ कोई बड़ी पदवी जुड़ी है। उसके विचार और आचरण को भी देखिए।
सवाल कीजिए।
तर्क कीजिए।
प्रमाण माँगिए।
सत्य को समझिए।
और फिर अपना निर्णय स्वयं कीजिए।
क्योंकि स्वाभिमान का अर्थ किसी दूसरे का अपमान करना नहीं है। स्वाभिमान का अर्थ है—हर मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करना और अपने साथ भी गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा रखना।
मानवता सर्वोपरि हो, समानता जीवन का आधार हो, स्वतंत्रता स्वाभिमान बने और संविधान अधिकारों की रक्षा का मार्ग दिखाए—यही एक जागरूक समाज की पहचान हो सकती है।
सद्गुरु कबीर के संदेश को केवल मानने के बजाय उसे समझने, आत्मसात करने और जीवन में उतारने की जरूरत है। सत्य को सत्य के रूप में स्वीकार करने और असमानता को असमानता के रूप में पहचानने का साहस ही वास्तविक सामाजिक जागरण की शुरुआत है।
साहेब बंदगी साहेब!
विशेष रिपोर्ट: रामलाल यादव, ब्यूरोचीफ, राजस्थान
राष्ट्रीय समाचार पत्र/पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल: समझो भारत
संपर्क: 8010884848, 9528680561
वेबसाइट: www.samjhobharat.com
No comments:
Post a Comment