उन्होंने कहा कि कर्बला की धरती पर जो संघर्ष हुआ, वह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि मानवता के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसने यह सिखाया कि अन्याय और अत्याचार के सामने झुकना नहीं चाहिए, चाहे उसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।
फजल अली के अनुसार, हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों ने कठिन परिस्थितियों, प्यास और भूख के बावजूद सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उनका बलिदान आज भी दुनिया को यह संदेश देता है कि इंसानियत और न्याय की रक्षा के लिए हर त्याग छोटा है।
उन्होंने कहा कि कर्बला हमें वफ़ा, सब्र, साहस और इंसानियत का पाठ पढ़ाती है। वफ़ा केवल किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि सत्य और नैतिक मूल्यों से निभाई जानी चाहिए। इसी तरह मोहब्बत केवल शब्दों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की मदद के रूप में दिखाई देनी चाहिए।
युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी की जुबान पर "या हुसैन" हो लेकिन उसके व्यवहार में छल, अन्याय या नफरत दिखाई दे, तो वह कर्बला के वास्तविक संदेश को नहीं समझ पाया है। हुसैनियत का असली अर्थ जरूरतमंद की मदद करना, भूखे को भोजन देना, कमजोर का सहारा बनना और समाज में भाईचारे को बढ़ावा देना है।
उन्होंने कहा कि आज समाज को केवल इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम लेने वालों की नहीं, बल्कि उनके चरित्र, उनके साहस और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले लोगों की आवश्यकता है। यही कर्बला का वास्तविक संदेश है और यही वह शिक्षा है जो हर दौर में इंसानियत को मजबूत बनाती है।
मोहर्रम का यह अवसर हमें आत्ममंथन करने का मौका देता है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय, करुणा और मानवता के मूल्यों को कितना स्थान दे रहे हैं। कर्बला की याद तभी सार्थक होगी, जब उसके संदेश को व्यवहार में उतारा जाए और समाज को बेहतर बनाने में योगदान दिया जाए।रिपोर्ट: शाकिर अली, बिडौली (झिंझाना), जनपद शामली, उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय समाचार पत्र/पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल: समझो भारत�संपर्क: 8010884848 , ईमेल: samjhobharat@gmail.com
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